सूरह मरियम: विश्वास — असंभव के सामने
एक कुँवारी माँ, एक बोलता हुआ शिशु, एक बूढ़े की औलाद — सूरह मरियम असंभव लगने वाली घटनाओं के ज़रिए विश्वास की गहराई को छूती है।
सूरह मरियम: विश्वास — असंभव के सामने
असंभव — यह शब्द हम तब कहते हैं जब कुछ हमारी समझ से परे हो।
लेकिन "असंभव" की सीमा कहाँ है? क्या जो हमें असंभव लगता है, वह वाकई असंभव है?
सूरह मरियम तीन ऐसी घटनाएं सुनाती है जो "असंभव" की हमारी परिभाषा को चुनौती देती हैं।
ज़कर्या — बुढ़ापे में दुआ
ज़कर्या एक बूढ़े नबी थे। पत्नी बाँझ थीं। लेकिन उन्होंने दुआ माँगी — "ऐ रब! मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गईं, सिर सफ़ेद हो गया — लेकिन मैंने कभी निराश होकर नहीं माँगा।"
यह दुआ का एक अनूठा अंदाज़ है — "मैंने कभी निराश होकर नहीं माँगा।" वे रिश्ते की याद दिला रहे थे — "तू जानता है, मैं हमेशा उम्मीद रखता हूँ।"
और जवाब मिला — बेटा होगा। नाम — यहया (John the Baptist)।
उम्मीद — यही सबसे बड़ी दुआ है।
मरियम — एकांत में शक्ति
मरियम एक ऐसी महिला थीं जिनका पूरा जीवन ईश्वर की सेवा में था। जब फ़रिश्ता जिब्रील उनके पास आया, वे डर गईं।
फ़रिश्ते ने कहा — "मैं तुम्हारे रब का भेजा हुआ हूँ — तुम्हें एक पाक बेटा देने।"
मरियम ने पूछा — "लेकिन मुझे कोई पुरुष नहीं छुआ?"
जवाब था — "यही होगा। ईश्वर जो चाहे करता है।"
यह विश्वास का एक अद्वितीय क्षण है — असंभव को स्वीकार करना।
ईसा — पालने में बोलना
जब मरियम बच्चे को लेकर अपनी क़ौम के पास आईं, तो लोगों ने इल्ज़ाम लगाया।
तब नवजात शिशु ने बोला — "मैं ईश्वर का बंदा हूँ। उसने मुझे किताब दी। नबी बनाया। मुझे मुबारक किया।"
यह कुरान का स्पष्ट बयान है — ईसा ख़ुद अपने को "ईश्वर का बंदा" कह रहे हैं।
सूरह मरियम और ईसाई-मुस्लिम संवाद
यह सूरह एक ऐतिहासिक भूमिका निभाती है। जब कुछ मुसलमान हब्शा (Ethiopia) भागे और ईसाई बादशाह नज्जाशी के सामने पेश हुए — तो इसी सूरह की आयतें पढ़ी गईं।
नज्जाशी रो पड़े। उन्होंने कहा — ईसा के बारे में जो यह कहता है, उससे ज़्यादा हम नहीं कह सकते।
इब्राहीम — बाप का दर्द
सूरह में इब्राहीम की कहानी है — उनके पिता मूर्तिपूजक थे। इब्राहीम ने उन्हें समझाया। पिता ने मारने की धमकी दी।
और इब्राहीम का जवाब — "तुम पर सलाम, मैं अपने रब से तुम्हारे लिए माफ़ी माँगूँगा।"
प्रेम और सत्य का संतुलन — यह मुश्किल है। लेकिन इब्राहीम ने दिखाया — दोनों एक साथ संभव हैं।
विश्वास का निमंत्रण
सूरह मरियम का संदेश यह नहीं कि "बस विश्वास करो।"
बल्कि यह है — जो असंभव लगे, उसके बारे में भी सोचो। क्या आपके "असंभव" की सीमाएं सच में absolute हैं? या वे आपके ज्ञान की सीमाएं हैं?
faq
मरियम का कुरान में क्या स्थान है?
मरियम कुरान में एकमात्र महिला हैं जिनके नाम पर एक पूरी सूरह है। उन्हें 'सिद्दीक़ा' (सत्यनिष्ठ) कहा गया है।
ज़कर्या की दुआ क्यों अनोखी थी?
वे बूढ़े थे, पत्नी बाँझ थीं — फिर भी बेटे की दुआ माँगी। यह तर्क से परे विश्वास था।
ईसा मसीह ने पालने में क्या कहा?
पैदा होते ही कहा — 'मैं ईश्वर का बंदा हूँ, उसने मुझे किताब दी और नबी बनाया।' — यह कुरान का स्पष्ट बयान है।