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मक्की·40 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

78:1
पारा 30
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

عَمَّ يَتَسَآءَلُونَ﴿١﴾

वे आपस में किस चीज़ के विषय में प्रश्न कर रहे हैं?

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78:2
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

عَنِ ٱلنَّبَإِ ٱلْعَظِيمِ﴿٢﴾

बहुत बड़ी सूचना के विषय में।

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78:3
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ٱلَّذِى هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ﴿٣﴾

जिसमें वे मतभेद करने वाले हैं।

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78:4
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كَلَّا سَيَعْلَمُونَ﴿٤﴾

हरगिज़ नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।

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78:5
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ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ﴿٥﴾

फिर हरगिज़ नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।1

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78:6
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أَلَمْ نَجْعَلِ ٱلْأَرْضَ مِهَـٰدًا﴿٦﴾

क्या हमने धरती को बिछौना नहीं बनाया?

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78:7
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وَٱلْجِبَالَ أَوْتَادًا﴿٧﴾

और पर्वतों को मेखें?

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78:8
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وَخَلَقْنَـٰكُمْ أَزْوَٰجًا﴿٨﴾

तथा हमने तुम्हें जोड़े-जोड़े पैदा किया।

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78:9
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وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًا﴿٩﴾

तथा हमने तुम्हारी नींद को आराम (का साधन) बनाया।

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78:10
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وَجَعَلْنَا ٱلَّيْلَ لِبَاسًا﴿١٠﴾

और हमने रात को आवरण बनाया।

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78:11
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وَجَعَلْنَا ٱلنَّهَارَ مَعَاشًا﴿١١﴾

और हमने दिन को कमाने के लिए बनाया।

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78:12
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وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًا شِدَادًا﴿١٢﴾

तथा हमने तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आकाश) बनाए।

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78:13
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وَجَعَلْنَا سِرَاجًا وَهَّاجًا﴿١٣﴾

और हमने एक प्रकाशमान् तप्त दीप (सूर्य) बनाया।

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78:14
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وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلْمُعْصِرَٰتِ مَآءً ثَجَّاجًا﴿١٤﴾

और हमने बदलियों से मूसलाधार पानी उतारा।

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78:15
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لِّنُخْرِجَ بِهِۦ حَبًّا وَنَبَاتًا﴿١٥﴾

ताकि हम उसके द्वारा अन्न और वनस्पति उगाएँ।

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78:16
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وَجَنَّـٰتٍ أَلْفَافًا﴿١٦﴾

और घने-घने बाग़।1

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78:17
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ كَانَ مِيقَـٰتًا﴿١٧﴾

निःसंदेह निर्णय (फ़ैसले) का दिन एक नियत समय है।

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78:18
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًا﴿١٨﴾

जिस दिन सूर में फूँक मारी जाएगी, तो तुम दल के दल चले आओगे।

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78:19
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

وَفُتِحَتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ أَبْوَٰبًا﴿١٩﴾

और आकाश खोल दिया जाएगा, तो उसमें द्वार ही द्वार हो जाएँगे।

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78:20
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

وَسُيِّرَتِ ٱلْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا﴿٢٠﴾

और पर्वत चलाए जाएँगे, तो वे मरीचिका बन जाएँगे।1

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78:21
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًا﴿٢١﴾

निःसंदेह जहन्नम घात में है।

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78:22
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

لِّلطَّـٰغِينَ مَـَٔابًا﴿٢٢﴾

सरकशों का ठिकाना है।

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78:23
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

لَّـٰبِثِينَ فِيهَآ أَحْقَابًا﴿٢٣﴾

जिसमें वे अनगिनत वर्षों तक रहेंगे।

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78:24
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

لَّا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًا وَلَا شَرَابًا﴿٢٤﴾

वे उसमें न कोई ठंड चखेंगे और न पीने की चीज़।

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78:25
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

إِلَّا حَمِيمًا وَغَسَّاقًا﴿٢٥﴾

सिवाय अत्यंत गर्म पानी और बहती पीप के।

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78:26
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

جَزَآءً وِفَاقًا﴿٢٦﴾

यह पूरा-पूरा बदला है।

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78:27
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

إِنَّهُمْ كَانُوا۟ لَا يَرْجُونَ حِسَابًا﴿٢٧﴾

निःसंदेह वे हिसाब से नहीं डरते थे।

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78:28
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا كِذَّابًا﴿٢٨﴾

तथा उन्होंने हमारी आयतों को बुरी तरह झुठलाया।

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78:29
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

وَكُلَّ شَىْءٍ أَحْصَيْنَـٰهُ كِتَـٰبًا﴿٢٩﴾

और हमने हर चीज़ को लिखकर संरक्षित कर रखा है।

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78:30
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 582

فَذُوقُوا۟ فَلَن نَّزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا﴿٣٠﴾

तो चखो, हम तुम्हारे लिए यातना ही अधिक करते रहेंगे।1

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78:31
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ مَفَازًا﴿٣١﴾

निःसंदेह (अल्लाह से) डरने वालों के लिए सफलता है।

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78:32
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

حَدَآئِقَ وَأَعْنَـٰبًا﴿٣٢﴾

बाग़ तथा अंगूर।

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78:33
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

وَكَوَاعِبَ أَتْرَابًا﴿٣٣﴾

और समान उम्र वाली नवयुवतियाँ।

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78:34
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

وَكَأْسًا دِهَاقًا﴿٣٤﴾

और छलकते हुए प्याले।

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78:35
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا وَلَا كِذَّٰبًا﴿٣٥﴾

वे उसमें न तो कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न (एक दूसरे को) झुठलाना।

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78:36
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

جَزَآءً مِّن رَّبِّكَ عَطَآءً حِسَابًا﴿٣٦﴾

यह तुम्हारे पालनहार की ओर से बदले में ऐसा प्रदान है जो पर्याप्त होगा।

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78:37
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

رَّبِّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ٱلرَّحْمَـٰنِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًا﴿٣٧﴾

जो आकाशों और धरती तथा उनके बीच की हर चीज़ का पालनहार है, अत्यंत दयावान् है। उससे बात करने का उन्हें अधिकार नहीं होगा।

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78:38
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

يَوْمَ يَقُومُ ٱلرُّوحُ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ صَفًّا ۖ لَّا يَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَقَالَ صَوَابًا﴿٣٨﴾

जिस दिन रूह़ (जिबरील) तथा फ़रिश्ते पंक्तियों में खड़े होंगे, उससे केवल वही बात कर सकेगा जिसे रहमान (अल्लाह) आज्ञा देगा और वह ठीक बात कहेगा।

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78:39
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ مَـَٔابًا﴿٣٩﴾

यही (वह) दिन है जो सत्य है। अतः जो चाहे अपने पालनहार की ओर लौटने की जगह (ठिकाना) बना ले।1

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78:40
पारा 30 · हिज़्ब 59 · पृष्ठ 583

إِنَّآ أَنذَرْنَـٰكُمْ عَذَابًا قَرِيبًا يَوْمَ يَنظُرُ ٱلْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ ٱلْكَافِرُ يَـٰلَيْتَنِى كُنتُ تُرَٰبًۢا﴿٤٠﴾

निःसंदेह हमने तुम्हें एक निकट ही आने वाली यातना से डरा दिया है, जिस दिन मनुष्य देख लेगा, जो कुछ उसके दोनों हाथों ने आगे भेजा है, और काफिर कहेगा : ऐ काश कि मैं मिट्टी होता!1

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