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मक्की·20 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

90:1
पारा 30
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

لَآ أُقْسِمُ بِهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ﴿١﴾

मैं इस नगर (मक्का) की क़सम खाता हूँ!

—
90:2
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

وَأَنتَ حِلٌّۢ بِهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ﴿٢﴾

तथा तुम्हारे लिए इस नगर में लड़ाई हलाल होने वाली है।

—
90:3
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

وَوَالِدٍ وَمَا وَلَدَ﴿٣﴾

तथा क़सम है पिता तथा उसकी संतान की!

—
90:4
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ فِى كَبَدٍ﴿٤﴾

निःसंदेह हमने मनुष्य को बड़ी कठिनाई में पैदा किया है।

—
90:5
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

أَيَحْسَبُ أَن لَّن يَقْدِرَ عَلَيْهِ أَحَدٌ﴿٥﴾

क्या वह समझता है कि उसपर कभी किसी का वश नहीं चलेगा?1

—
90:6
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

يَقُولُ أَهْلَكْتُ مَالًا لُّبَدًا﴿٦﴾

वह कहता है कि मैंने ढेर सारा धन ख़र्च कर दिया।

—
90:7
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

أَيَحْسَبُ أَن لَّمْ يَرَهُۥٓ أَحَدٌ﴿٧﴾

क्या वह समझता है कि उसे किसी ने नहीं देखा?1

—
90:8
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

أَلَمْ نَجْعَل لَّهُۥ عَيْنَيْنِ﴿٨﴾

क्या हमने उसके लिए दो आँखें नहीं बनाईं?

—
90:9
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

وَلِسَانًا وَشَفَتَيْنِ﴿٩﴾

तथा एक ज़बान और दो होंठ (नहीं बनाए)?

—
90:10
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

وَهَدَيْنَـٰهُ ٱلنَّجْدَيْنِ﴿١٠﴾

और हमने उसे दोनों मार्ग दिखा दिए?!

—
90:11
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

فَلَا ٱقْتَحَمَ ٱلْعَقَبَةَ﴿١١﴾

परंतु उसने दुर्लभ घाटी में प्रवेश ही नहीं किया।

—
90:12
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْعَقَبَةُ﴿١٢﴾

और तुम्हें किस चीज़ ने ज्ञात कराया कि वह दुर्लभ 'घाटी' क्या है?

—
90:13
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

فَكُّ رَقَبَةٍ﴿١٣﴾

(वह) गर्दन छुड़ाना है।

—
90:14
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

أَوْ إِطْعَـٰمٌ فِى يَوْمٍ ذِى مَسْغَبَةٍ﴿١٤﴾

या किसी भूख वाले दिन में खाना खिलाना है।

—
90:15
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

يَتِيمًا ذَا مَقْرَبَةٍ﴿١٥﴾

किसी रिश्तेदार अनाथ को।

—
90:16
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

أَوْ مِسْكِينًا ذَا مَتْرَبَةٍ﴿١٦﴾

या मिट्टी में लथड़े हुए निर्धन को।1

—
90:17
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

ثُمَّ كَانَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْمَرْحَمَةِ﴿١٧﴾

फिर वह उन लोगों में से हो, जो ईमान लाए और एक-दूसरे को धैर्य रखने की सलाह दी और एक-दूसरे को दया करने की सलाह दी।

—
90:18
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 594

أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ﴿١٨﴾

यही लोग दाहिने हाथ वाले (सौभाग्यशाली) हैं।

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90:19
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 595

وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا هُمْ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ﴿١٩﴾

और जिन लोगों ने हमारी आयतों का इनकार किया, वही लोग बाएँ हाथ वाले (दुर्भाग्यशाली) हैं।

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90:20
पारा 30 · हिज़्ब 60 · पृष्ठ 595

عَلَيْهِمْ نَارٌ مُّؤْصَدَةٌۢ﴿٢٠﴾

उनपर (हर ओर से) बंद की हुई आग होगी।

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पिछली आयतAl-Fajrअगली आयतAsh-Shams