109:1(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ काफ़िरो!
109:2मैं उसकी इबादत नहीं करता, जिसकी तुम इबादत करते हो।
109:3और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।
109:4और न मैं उसकी इबादत करने वाला हूँ, जिसकी इबादत तुमने की है।
109:5और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।
109:6तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है।1
110:1(ऐ नबी!) जब अल्लाह की सहायता एवं विजय आ जाए।
110:2और आप लोगों को देखें कि वे अल्लाह के धर्म में दल के दल प्रवेश कर रहे हैं।1
110:3तो आप अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करें और उससे क्षमा माँगें, निःसंदेह वह बहुत तौबा क़बूल करने वाला है।1
111:1अबू लहब के दोनों हाथ नाश हो जाएँ! और वह (स्वयं) विनष्ट हो गया।1
111:2उसका धन तथा जो कुछ उसने कमाया था, उसके काम नहीं आया।
111:3जल्द ही वह लपट वाली आग में दाख़िल होगा।1
111:4तथा उसकी पत्नी (भी जहन्नम में जाएगी), जो ईंधन उठाने वाली है।
111:5उसकी गर्दन में मज़बूत बटी हुई रस्सी होगी।1